अक्सर कहा जाता है कि प्रबंधन कोरी किताबों को पढ़ कर नहीं सीखा जा सकता, इसे वास्तविक जीवन की जटिल परिस्थितियों से संघर्ष कर ही सीखा जा सकता है। यही कारण है कि कालजयी रचनाएं अपने समय के मनुष्य के द्वंद्व का सबसे बड़ा गवाह होती हैं बरसों तक कायम रहने वाली इन रचनाओं की चमक में मनुष्य अपने अपने अंधेरे क्षणों में रोशनी प्राप्त करता है। कालजयी रचनाएं चाहें भगवदगीता हो या इलियड हो अथवा पिछली शताब्दी की रचना वार एंड पीस, सारी रचनाओं की पृष्ठभूमि युद्ध के धरातल पर तैयार की गई है।

प्रबंधन का पहला सूत्र गीता से:

कुरुक्षेत्र के मैदान में लिखी गई इस महान रचना का उद्भव ही नहीं हो पाता अगर अर्जुन ने कुशल सलाहकार अथवा युद्ध प्रबंधक नहीं चुना होता। अर्जुन और दुर्योधन अक्षोहिणी सेना का सहयोग प्राप्त करने कृष्ण के पास गए थे। दुर्योधन ने अक्षोहिणी सेना प्राप्त की और अर्जुन ने मैनेजर के रूप में कृष्ण को चुना। आगे स्पष्ट है कि युद्ध के हर अहम मौके पर कृष्ण ने अपनी कूटनीतिक चालों से कौरवों के इरादे ध्वस्त कर दिए।

प्रबंधन का दूसरा सूत्र गीता से:

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:, गीता की शुरुआत ही धर्म शब्द से होती है अर्थात युद्ध का उद्देश्य यहां पर केवल महत्वाकांक्षा की प्रतिस्पर्धा नहीं है अपितु युद्ध नैतिक मूल्यों के लिए भी लड़ा जा रहा है। गीता का असल प्रश्न दूसरे अध्याय सांख्य योग से शुरू होता है। अर्जुन अनिर्णय का शिकार है यह ऐसी ही स्थिति है जिसका सामना अधिकांश प्रबंधक कर रहे हैं। उन्हें कठिन लक्ष्य दिए जाते हैं जिनको पूरा करना कई बार उन्हें असंभव जान पड़ता है।

अर्जुन के सामने भी यही समस्या थी। सामने भीष्म और द्रोण जैसे दिग्गज है वह गुरु भी हैं और श्रेष्ठ योद्धा भी। ऐसे में युद्ध के पूर्व ही अर्जुन अपना गांडीव रख देते हैं। कृष्ण ऐसे समय में प्रोत्साहक (मोटिवेटर) के रूप में सामने आते हैं। वह अर्जुन को चुनौती देते हैं कि हतो वा प्राप्यसि स्वर्गा, जीत्वा वा भोक्ष्यसे महीम। अर्थात जीतोगे तो धरती का ऐश्वर्य भोगोगे और वीरगति प्राप्त करने पर स्वर्ग। मोटिवेशन की प्रबंधन में सबसे बड़ी भूमिका है और यहीं से गीता की शुरुआत होती है।

गीता का तीसरा सूत्र:

गीता का संदेश वेदों और उपनिषदों के संदेश से ही अधिक परिष्कृत होकर सामने आया है। बृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया है कि आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवतु। अर्थात अगर आपने अपनी आत्मा का संबंध इस विश्वआत्मा से जोड़ लिया तो भेदभाव औरर् ईष्या की सारी भावना समाप्त हो जाएगी। पूरी गीता इस शुध्द आत्मा की तलाश का आख्यान है। गीता का मुख्य संदेश है कर्ता भाव से मुक्ति। जब मनुष्य कोई काम करता है और इसके पीछे अपनी पीठ थपथपाता है तब एक तरह से अहंकार की सृष्टि होती है जिससे कई तरह के मनोविकारों का जन्म होता है।

महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में गीता के एक सुंदर श्लोक से इसे समझाया था। ध्यायते विषयोन्पुनस:…. पूरे श्लोक का मर्म है कि विषयों को हमेशा सोचने वाले व्यक्ति के मन में यह स्थाई विकार के रूप में शामिल हो जाते हैं और इससे क्रोध आदि विकारों का जन्म होता है इससे स्मृति भंग हो जाती है और अतत: आत्मा का नाश हो जाता है। दरअसल प्रबंधन के क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति के मन में भी कई तरह की आकांक्षाएं होती हैं, कई बार यह आकांक्षाएं तुलना का रूप ले लेती है इससे एक तरह के चूहा दौड़ की शुरुआत होती है जिससे सही लक्ष्यों की ओर से मन भटक जाता है।

गीता का चौथा सूत्र:

जब कृष्ण अपना दिव्य रूप अर्जुन को दिखाते हैं तो उनके मुख से अनायास ही निकल जाता है,

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतमदर्शनम अनेक दिव्याभरणं

दिव्यानेकोद्यातायुधम, दिव्यमाल्यामबरधरं, दिव्य गंधानुलेपनम

सर्वाश्चर्यं मयं विश्वोतदेवमुखम।

यहां पर कृष्ण पर्सनालिटी के प्रति सजगता दिखा रहे हैं। एक प्रोफेशनल को कैसे रहना चाहिए। अपने दिव्य रूप में वह अनेक सुगंधित द्रव्यों से सजे हैं उन्होंने दिव्य माला धारण कर रखी है। कहने का तात्पर्य यह है कि कृष्ण संपूर्ण सौंदर्य पर जोर देते हैं अर्थात मन की शुध्दता और तन का वैभव।

गीता का पांचवा सूत्र:

कृष्ण गीता में कर्म पर जोर तो देते ही हैं उनका जोर ज्ञान पर भी होता है। उन्होंने कहा है कि न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिहं विद्यतं। प्रोफेशनल लाइफ में तरक्की करने आपको लगातार ज्ञान से अपडेट करना होगा।

गीता का छठा सूत्र:

गीता मनुष्य को लगातार आत्म-निरीक्षण के लिए प्रेरित करती है। पश्चिम में सफल प्रबंधन के लिए प्रबंधक के चरित्र में कुछ खास गुणों का होना अनिवार्य माना गया। यही बात गीता में भी कृष्ण ने कही है

अभयं सत्व संशुध्दिज्र्ञान योग व्यवस्थिति:॥

दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप अर्जवम॥

गीता में विस्तार से सात्विक गुण वाले व्यक्ति और राजसिक एवं तामसिक गुणों वाले प्रवृत्ति के व्यक्ति के बीच अंतर रेखांकित किया गया है। जीवन की परिस्थितियां मनुष्य के भीतर द्वंद्व उत्पन्न करती रहती हैं, कई बार मनुष्य दूसरों के कहने पर उद्विग्न हो जाता है और कई बार अपने कटु वचनों से दूसरों को उद्विग्न कर देता है। प्रोफेशनल लाइफ में यह दोनों वाकये कैरियर के लिए घातक होती हैं। गीता इससे बचते हुए स्वधर्म का पालन करने का सलाह देती है। यह ईर्ष्या से भरे वातावरण में संजीवनी की तरह साबित होती है।

श्रेयान स्वधर्मों विगुण: परधर्मास्वनिष्ठितात।

स्वभावं नियतं कर्म कुर्वन्नाप्तोति किल्बिषम॥

अंत में गीता का मैनेजमेंट प्रबंधकों को सबसे बड़ा संदेश यह है कि संशय का त्याग कर (संशयात्मा विनश्यति) अपने कर्म का पालन करें और फल की चिंता परमात्मा पर छोड़ दें।

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