इच्छाओं को नियमित करने से स्वास्थ्य को ठीक रखने में सहायता मिलती है तथा जीवन प्राकृतिक नियमों के अनुसार चलने लगता है। इस नियमन या अनुशासन का आशय इच्छाओं का दमन नहीं है, बल्कि इसका अर्थ अपनी क्षमताओं के अनुसार संतुलन स्थापित करना है। बहुत अधिक खाना, सोना, जागना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। ऐसा करने से शरीर की विभिन्न प्रणालियों को क्षति पहुंचती है तथा जीवन का उद्देश्य ही नष्ट हो जाता है। इससे मस्तिष्क क्षीण होता है, हीनभावना उत्पन्न होती है तथा आत्मविश्वास का ह्रास होता है।

जब संवेगों का अध्ययन किया जाता है तो ज्ञात होता है कि नकारात्मक संवेगों की मुख्य सात धारायें होती हैं जो मूलभूत आवश्यकताओं से ही निकलती हैं। क्रोध दूसरा नकारात्मक संवेग है जो चार मूल प्रवृत्तियों से उत्पन्न होता है। जब किसी इच्छा की पूर्ति नहीं होती है तो उससे मन व्यग्र या उद्विग्न होता है तथा उससे क्रोध का जन्म होता है। इसलिए व्यक्ति के लिए यह शिक्षा प्राप्त करना आवश्यक है कि क्रोध को कैसे नियंत्रित किया जाये।

ऐसा करना संभव है यदि व्यक्ति यह जान ले कि इच्छाओं को कैसे नियंत्रित किया जाये। व्यक्ति को यह पहले निश्चित कर लेना चाहिए कि कौन सी इच्छाएं उसके विकास में सहायक हैं तथा कौन इच्छाएं उसके विकास में बाधा उत्पन्न करती हैं। यदि बुद्धि को अनुशासित करना सीख लिया जाये तो इस कार्य में अवश्य सहायता मिलेगी। किसी व्यक्ति ने यदि यह योग्यता अपने में विकसित कर ली है तो क्रोधित होने के बाद वह स्वयं विश्लेषण करेगा कि वह क्यों क्रोधित हुआ तथा उसकी कौन सी इच्छाओं की पूर्ति नहीं हुई। ऐसा करके वह अपने क्रोध के मूल कारण को समझ सकेगा।

अहं आत्मविश्वास में सबसे अधिक बाधक है। यह व्यक्ति में इच्छाओं की पूर्ति के बाद उत्पन्न होता है। जब कोई चीज किसी के पास हो जाती है, लेकिन वही चीज उसके आसपास के लोगों के पास नहीं होती है तो वह अहम का शिकार हो जाता है।
गरीब मित्र को गले लगाना ही भक्ति व प्रेम है। प्रभु के भक्तों को यदि भगवान श्रीकृष्ण के चरित्र से यदि कुछ सीखना है तो अपने किसी पुराने या गरीब मित्र को गले लगाओ, क्योंकि कृष्ण-सुदामा प्रसंग से हमें शिक्षा मिलती है कि बिना कहे ही कमजोर व गरीब मित्र की सहायता करनी चाहिए, इसी में मित्र भाव की श्रेष्ठता होती है।

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